
पुणे कांग्रेस में उथल-पुथल: क्या होगा अगला कदम?
राजनीतिक संकट, दलबदल की अटकलें, और भविष्य की चुनौतियां
राजनीतिक उथल-पुथल: पुणे कांग्रेस में असंतोष
महाराष्ट्र में कांग्रेस की हालिया असफलताओं के बाद, पुणे में पार्टी के भीतर मतभेद और असंतोष बढ़ रहा है। लोकसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद विधानसभा चुनावों में मिली हार ने पार्टी के भीतर दरारें और चौड़ी कर दी हैं। आगामी नगर निगम चुनावों से पहले, पार्टी के कई नेताओं के दलबदल की अटकलें तेज हो गई हैं। एक पूर्व विधायक ने विधान परिषद, म्हाडा के सभापति पद, नगर निगम में 15-20 सीटें और शहराध्यक्ष पद की मांग की है, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई है।
यह पूर्व विधायक कथित रूप से एकनाथ शिंदे गुट से बातचीत कर रहे हैं। हालांकि, शिंदे गुट के पास पुणे में कोई प्रभावशाली नेता नहीं है, नाना भांगिरे के ‘मिशन टाइगर’ के बावजूद। पूर्व विधायक का मानना है कि यदि उन्हें जिम्मेदारी दी जाती है, तो वह शहर में शिंदे गुट को मजबूत कर सकते हैं, और इसी उम्मीद पर उन्होंने मुंबई में शिंदे गुट के वरिष्ठ नेताओं के साथ प्रारंभिक बैठकें भी की हैं। अंतिम निर्णय एकनाथ शिंदे द्वारा लिया जाएगा।
युवा कांग्रेस में असंतोष की आग
युवा कांग्रेस के रोहन सुरवसे भी पार्टी छोड़ने की संभावना पर विचार कर रहे हैं। उनके समर्थकों के साथ, वह अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो सकते हैं। सुरवसे का आरोप है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नए चेहरों को अवसर नहीं दे रहे हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है जो पार्टी के भीतर मौजूद उम्रवाद और पदानुक्रम को दर्शाता है। यदि सुरवसे कांग्रेस छोड़ते हैं, तो यह पार्टी के लिए एक बड़ा झटका होगा, खासकर युवाओं के बीच पार्टी के प्रभाव को कम करेगा।
इस घटनाक्रम का प्रभाव कांग्रेस के भविष्य पर पड़ेगा, क्योंकि युवा नेताओं का नाराज होना पार्टी के लिए चिंता का विषय है। इससे पार्टी के भीतर विभाजन गहरा हो सकता है और आने वाले चुनावों में पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। यह राजनीतिक दृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है, जिससे अन्य युवा नेताओं को भी पार्टी छोड़ने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
धंगेकर और शिंदे का बयान
इन सभी अटकलों के बीच, पूर्व विधायक रवींद्र धंगेकर ने दलबदल की अटकलों को खारिज किया है। उन्होंने कहा, “कांग्रेस एक बड़ी पार्टी है, जहां मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी तुरंत पार्टी छोड़ देगा। मैं हार मानने वालों में से नहीं हूं।” उनके इस बयान ने कुछ राहत प्रदान की है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति अभी भी नाजुक है।
कांग्रेस के शहर प्रभारी अरविंद शिंदे ने भी धंगेकर के जाने की संभावना से इनकार किया। उन्होंने कहा, “पार्टी ने उन्हें कई अवसर दिए हैं। मुझे विश्वास है कि वे अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को खतरे में नहीं डालेंगे।” लेकिन शिंदे का यह बयान भी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं करता है, क्योंकि पार्टी के भीतर असंतोष स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
भविष्य की चुनौतियां
पुणे कांग्रेस के लिए आने वाले नगर निगम चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं। पार्टी को अपनी एकता बनाए रखने और आंतरिक विवादों को सुलझाने की चुनौती का सामना करना होगा। अगर पार्टी अपने मतभेदों को नहीं सुलझा पाई, तो इससे नगर निगम चुनावों में पार्टी की संभावनाओं को भारी नुकसान हो सकता है। आने वाले दिनों में, पुणे कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा।
यह स्थिति महाराष्ट्र की राजनीति के लिए भी अहम है, क्योंकि कांग्रेस का प्रदर्शन राज्य में भविष्य के चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। अगर कांग्रेस पुणे में अपनी स्थिति को मजबूत नहीं कर पाती है, तो यह राज्य में पार्टी के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य पार्टियां इस स्थिति का लाभ कैसे उठाती हैं और क्या यह राज्य की राजनीतिक संरचना में बदलाव लाता है।